21 May 2009

तुझे ढ़ूँढा

सितारो की इन महेफिल में तुझे ढ़ूँढा
बहारों की इन परछाई में तुझे ढ़ूँढा.

निगाहों में आबाद निकला था ऐसे कि
अलंकारो की इन फिजाओ में तुझे ढ़ूँढा.

आज भवरों के साथ खेलता था कोइ
जैसे मौसम की इन शरारत में तुझे ढ़ूँढा.

रोशनी की शतरंज में कोई चाल ऐसी
जैसे पायदल की कवायत में तुझे ढ़ूँढा.

गुलशन की बहारो में बीखरी यादों थी
जैसे बसंत की लौटती हवाओ में तुझे ढ़ूँढा.

कांति वाछाणी

8 comments:

  1. बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

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  2. अच्छी कोशिश। जरा तुझे ढ़ूँढ़ा लिखें तो मजा आ जाय।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  3. ठीक-ठाक शुरूआत...
    शुभकामनाएं....

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  4. mila ke nahi. narayan narayan

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  5. Saamne kuch peeche kuch aur kaha karte hain,
    Is Shahar me bahurupiye raha karte hain.

    Bas kisi tarah se apna bhala ho jaaye,
    isi wazah se log auro ka bura karte hain.

    Jinke bas me nahi hota bulandiyaa choona
    fikre wo auron ki fatah par kasa karte hain.

    Roshni jitna dabaoge aur baahar aayegi
    kahi haathon ke ghere se samundar rooka karte hain
    @Kavi Deepak Sharma
    http://www.kavideepaksharma.co.in

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  6. चिटठा जगत मैं आप का स्वागत है । लिखते रहीये हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

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  7. achi savedana hee

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